भड़ैती King Rahul Gandhi

Rahul Gandhi समझ नहीं पाए कि विपक्ष मतलब हंगामा, बवाल नहीं

भारतीय संसदीय लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका केवल सरकार का विरोध करना नहीं, बल्कि उसे जवाबदेह बनाना भी है। संसद में उठाए गए मुद्दे तभी प्रभावी माने जाते हैं जब वह सदन की चारदीवारी से निकलकर जनता के बीच विश्वसनीयता प्राप्त करें। किसी भी विपक्ष की सफलता का वास्तविक पैमाना यह नहीं है कि उसने कितने दिन संसद बाधित की, बल्कि यह है कि उसके आरोपों को बाद में न्यायपालिका, संवैधानिक संस्थाओं अथवा जांच एजेंसियों से कितना संस्थागत समर्थन मिला और क्या वह अंततः जनता के मतदान व्यवहार को प्रभावित कर सके। इन पैमानों के अनुसार अगर देखा जाए तो राहुल गांधी और उनकी अगुवाई वाला गठबंधन पूरी तरह विफल नजर आता है। 2014 में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे व 2024 में नेता प्रतिपक्ष बने राहुल गांधी व उनकी अगुवाई वाली कांग्रेस नीत गठबंधन द्वारा उठाया गया एक भी मुद्दा न अदालत में टिका, न जनता ने ही उस पर मुहर लगाई। तथ्य विहीन विषयों को लेकर जिस तरह राहुल गांधी ने अपनी आक्रामकता को धार दी है, उसी तेजी से कांग्रेस और उसकी अगुवाई वाले गठबंधन में शामिल दलों का पतन भी हुआ है। यानी जब जब राहुल लड़ता है, कांग्रेस को पीछे करता है। ऐसा इसलिए भी कि राहुल गांधी की यह लड़ाइयां तथ्य आधारित तर्कों पर कम, मीडिया में सुर्खियां बटोरने, रील बनाने के लिए ज्यादा रही हैं।

कभी विपक्षी नेताओं के भाषण का लोग करते थे इंतजार

एक समय था जब भारत में विपक्षी नेताओं के भाषणों को सुनने व पढ़ने का लोग इंतजार करते थे। जब सजीव प्रसारण नहीं था तो विपक्ष में बैठे अटल बिहारी वाजपेई जैसे नेताओं के भाषण पढ़ने सुनने के लिए लोग अगले दिन का इंतजार करते थे। फरवरी 1992 से बजट का सजीव प्रसारण शुरू हुआ। इसने नेताओं की तर्कशक्ति को जनता तक पहुंचाने में बहुत मदद की। 2004 में जब संसद के लिए अलग सैटेलाइट चैनल के माध्यम से सजीव प्रसारण शुरू हुआ तो उस समय विपक्ष में बैठे भाजपा के अरुण जेटली, सुषमा स्वराज जैसे नेताओं के भाषण घर घर चर्चा का विषय बनें। इन नेताओं के भाषणों की खासियत थी, तथ्य आधारित तर्कशक्ति। वह सिर्फ सुनी सुनाई बातों पर या फर्जी कहानियों के आधार पर आरोप नहीं लगाते थे वरन तथ्य आधारित आरोप लगाते थे जिसे बाद में  न्यायालय में भी सौंपा जाता था।

7 1. upa era opposition raised issues which appealled to public भड़ैती King Rahul Gandhi

विपक्ष में रहते भाजपा ने यूपीए पर किया था गंभीर हमला

विपक्ष में रहते हुए भाजपा ने जिन मुद्दों को संसद में लगातार उठाया, चाहे वह 2जी स्कैम हो, कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला हो, कोलगेट घोटाला हो,  आदर्श हाउसिंग सोसाइटी, या अन्य घोटाले, उन पर सीएजी से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक ने कार्रवाई की। जांच के आदेश दिए व आरोपियों को गिरफ्तार किया गया। उदाहरण के लिए अगर सिर्फ 2 जी घोटाले की ही बात करें तो सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में 2012 में आवंटन प्रक्रिया को मनमाना और संविधान के अनुच्छेद 14 के विपरीत बताते हुए  122 दूरसंचार लाइसेंस को रद्द कर दिया था। संसद में उठाए गए इन मुद्दों को ही बाद में भाजपा ने चुनावों में भी प्रयोग किया और उन्हें जनता का पूरा साथ मिला। परिणामस्वरूप 2014 में भाजपा को केन्द्र में पूर्ण बहुमत प्राप्त हुआ। इस तरह भाजपा ने दस साल में कांग्रेस की अगुवाई वाले गठबंधन से सत्ता छीन ली। इस कार्य में विपक्ष में रहते हुए उनके द्वारा उठाए गए मुद्दों, संसद और सड़क पर इनके समर्थन में दिए गए भाषणों ने बहुत ही बड़ी भूमिका निभाई थी।

बतौर विपक्ष अब तक प्रभाव नहीं जमा पाई कांग्रेस व  Rahul Gandhi

2014 में पूर्ण बहुमत के साथ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की सरकार बनने के बाद कांग्रेस पहली बार लंबे समय के लिए विपक्ष की भूमिका में आई। 2014 में  44  और 2019 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस 52 सीटों तक सिमट गई। यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दो कार्यकाल पूर्ण होने के बाद वर्ष 2024 के चुनावों में भी कांग्रेस सत्ता में वापसी नहीं कर सकी। विपक्ष में रहते हुए कांग्रेस राहुल गांधी के नेतृत्व में लगातार संसद और संसद के बाहर अपनी आक्रामकता में वृद्धि करती नजर तो आई पर उनके द्वारा उठाए गए मुद्दे जनता से लेकर अदालत तक कहीं भी टिक नहीं पाए। 2015 में कांग्रेस ने भूमि अधिग्रहण संशोधन कानून को लेकर हंगामा किया था। सरकार को अंततः यह बिल वापस लेना पड़ा था। यह इकलौती सफलता उस पूरे कार्यकाल में कांग्रेस को मिली थी। 2015 में इस कानून संशोधन के खिलाफ हुई रैली में राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर व्यक्तिगत आक्रमण किया था। इसमें उन्होंने मोदी पर सूट बूट की सरकार चलाने का दावा किया था। बाद में कांग्रेस ने बकायदा इसे चुनावी अभियान बनाया, पर जनता ने इसे महत्व नहीं दिया। इसके बाद हुए चुनावों में कांग्रेस दिल्ली में साफ हो गई थी। बिहार में नीतीश कुमार के गठबंधन में रहने का फायदा कांग्रेस को मिला था और उसकी  सीटें चार से बढ़कर 27 हो गईं थीं। इसके बाद 2016 में हुए पांच राज्यों के चुनावों में पुडुचेरी छोड़ कांग्रेस सभी जगह से साफ हो गई थी।

Rahul Gandhi के मुद्दे न सड़क पर चले न न्यायालय में

Rahul Gandhi ने इससे कोई सबक न सीखते हुए 2018 में  एक विदेशी अखबार में छपी खबर के आधार पर राफेल के मुद्दे पर प्रधानमंत्री के खिलाफ चौकीदार चोर है का नारा लगाया। राहुल गांधी व कांग्रेस का आरोप था कि राफेल सौदे में भ्रष्टाचार हुआ है। इसके खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय का भी दरवाजा खटखटाया गया पर न्यायालय ने कोई गड़बड़ी न मिलने की बात कही। राहुल गांधी द्वारा लगाए गए आरोप न्यायालय में नहीं टिके। जनता ने भी उनके आरोपों को नकार दिया। इस दौरान राहुल गांधी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी थे। इसके बाद भी उनके विरोध में कोई गंभीरता नहीं थी। हालात का अंदाजा 20 जुलाई 2018 की घटना से लगाया जा सकता है। तेलगू देशम पार्टी द्वारा लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर बहस के दौरान राहुल गांधी अचानक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सीट तक गए और उन्हें सीट से उठने का इशारा करने लगे। मोदी के न उठाने पर राहुल गांधी ने बैठे बैठे ही उन्हें झप्पी दी। इसके बाद वह लौट कर अपनी सीट पर आए और आंख मार कर अपने इस कृत्य को मजाक बताया। इस घटना ने बतौर राजनीतिज्ञ उनकी परिपक्वता को लेकर उठ रहे संदेहों को और गहरा कर दिया। 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने ऐतिहासिक 303 सीटों पर जीत हासिल कर सरकार बनाई। कांग्रेस की सीटें भी इस दौरान 44 से बढ़कर 52 हो गईं।

rahul gandhi issues भड़ैती King Rahul Gandhiफर्जी मामले उठाकर Rahul Gandhi ने बिगाड़ी छवि

राहुल गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस 2019 से 2024 के बीच भी लगातार आक्रामक रही। नागरिकता संशोधन कानून (सीएए), कृषि कानून, पेगासस, महंगाई, बेरोजगारी, अग्निपथ योजना, मणिपुर हिंसा और अडाणी समूह से जुड़े आरोपों को लेकर कांग्रेस व उसकी अगुवाई वाले गठबंधन ने संसद से सड़क तक हल्ला मचाया पर उनके किसी भी मुद्दे को न तो न्यायालय का साथ मिला न जनता का। पेगासस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने जांच समिति गठित की पर खुद राहुल गांधी ही जांच में सहयोग देने से पीछे हट गए। बाकी विपक्षी नेता भी जांच में शामिल नहीं हुए। कुल मिलाकर इस पूरे दौर में कांग्रेस अराजकता का पर्याय बन गई। कांग्रेस ने लगातार संसद बाधित की। विदेशी अखबारों व विदेशी संस्थाओं द्वारा लगाए आरोपों को लेकर सरकार को घेरने का असफल प्रयास किया। उनके प्रयासों में तथ्यों के साथ साथ तर्कों की भी गंभीर कमी रही। नतीजा यह रहा कि यह मुद्दे जनता को कांग्रेस के पक्ष में करने में पूरी तरह विफल रहे। भाजपा ने तो दस साल में कांग्रेस से सत्ता छीन ली थी पर राहुल गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस ऐसा करने में पूरी तरह विफल रही।
Takatak ने दिलाई 99 सीट, धोखा खाई जनता ने फिर मुंह मोड़ा
 यही वजह रही कि 2024 के चुनाव में राहुल गांधी ने पिछले पांच साल में उठाए किसी भी मुद्दे को हाथ नहीं लगाया। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अबकी बार चार सौ पार के नारे का सहारा लिया और कहा कि अगर भाजपा को 400 पार सीटें आ गईं तो भाजपा संविधान बदल देगी। आरक्षण खत्म कर देगी। इसके साथ ही जनता को लुभाने के लिए उन्होंने हर परिवार को एक लाख रुपये सालाना यानी 8500 रुपये प्रति माह देने की खटाखट स्कीम की घोषणा की। आरक्षण समाप्त करने के दावे से भी ज्यादा प्रभाव खटाखट स्कीम का रहा। खासकर उत्तर प्रदेश व महाराष्ट्र जैसे राज्यों में जहां आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों की संख्या खासी अधिक है। इन दोनों ही राज्यों में भाजपा को तगड़ा झटका लगा। 2024 में कांग्रेस की सीट बढ़कर 99 हो गई पर वह लगातार तीसरी बार सत्ता से दूर रह कर इतिहास बना गई। यहां मजे की बात यह है कि बिहार में इसका कोई खास असर नहीं हुआ।

जब Rahul लड़ता है, कांग्रेस को पीछे करता है

राहुल गांधी व कांग्रेस ने संविधान बदलने व खटाखट की फर्जी बातें कर एक बार तो लोकसभा में अपनी सीटें बढ़वाने में कामयाब रहे पर अपनी विश्वसनीयता खो दी। बाद के चुनावों में जनता ने उनकी किसी भी बात का भरोसा नहीं किया। 2024 व इसके बाद हुए चुनावों में कांग्रेस राज्य दर राज्य बुरी तरह से हारती गई। हालात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 2014 में लोकसभा चुनाव हारने वाली कांग्रेस देश के सात राज्यों में अकेले दम पर सत्ता में थी और छह राज्यों में उसके गठबंधन की सरकार थी। 2024 में सिर्फ तीन राज्यों में कांग्रेस की खुद की सरकार थी व एक में वह गठबंधन के साथ सत्ता में थी। 2026 में भी कांग्रेस सिर्फ तीन राज्यों में अकेले दम पर सत्ता में है। हां गठबंधन वाली सरकारें जरूर बढ़ कर तीन हो गईं हैं पर इसमें राहुल गांधी व उनके द्वारा उठाए मुद्दों का कोई खास असर नहीं रहा। यह परिणाम बताते हैं कि राहुल गांधी ने जैसे जैसे अपनी आक्रामकता बढ़ाई, कांग्रेस अपनी जमीन खोती गई। तथ्यों व तर्कों को सलीके से प्रस्तुत कर जनता को समझाने की जगह कुछ भी बोल कर भाग लेने, बहस में गंभीरता से शामिल न होने की राहुल गांधी व कांग्रेस की अदा अब लोगों को समझ में आ गई है। मतदाताओं ने उन्हें गंभीरता से लेना बंद कर दिया है। फिलहाल, पिछले 12 वर्षों में कांग्रेस राहुल गांधी के नेतृत्व में तीन लोकसभा चुनाव हार चुकी है। इस दौरान करीब 74 विधानसभा चुनावों में 63 में कांग्रेस की हार हुई है।

कांग्रेस मुक्त हुए पांच राज्य

आज पांच राज्यों में कांग्रेस के पास एक भी विधायक नहीं हैं। इसमें दिल्ली व आंध्र प्रदेश जैसे बड़े राज्य शामिल हैं। दस राज्यों में कांग्रेस के पास दस से भी कम विधायक हैं। उत्तर प्रदेश बंगाल जैसे बड़े राज्यों में कांग्रेस के पास मात्र दो दो विधायक ही हैं। इन स्थितियों के बावजूद तात्कालिक सुर्खियां बटोरने के लिए संसद में हंगामा करने की राहुल गांधी व कांग्रेस की कवायद जारी है। सत्ता से 12 वर्षों के वनवास के बावजूद कांग्रेस व उसका नेतृत्व खास कर राहुल गांधी  किसी भी विषय पर तथ्यों के दम पर तार्किक बहस करने को तैयार नहीं दिख रहे। संसद को लगातार बाधित कर रहे राहुल गांधी का सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक 2026 में दिया गया भाषण कम से कम यही साबित करता है। पूरे 55 मिनट के भाषण में वह बिल के ऊपर एक भी शब्द नहीं बोले। कमजोर विपक्ष अगर सत्ता पक्ष के लिए वरदान है तो जनता के लिए अभिशाप। जनता को इस अभिशाप से कब मुक्ति मिलेगी, समय बताएगा।

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