सदियों से दबे कुचले भारतीयों को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी में एक मसीहा दिखा था जो 56 इंच का सीना होने और सत्य-सनातन-संस्कृति के लिए किसी भी दबाव में न झुकने का दावा करता था। आजादी के बाद सत्ता पर रहे नेताओं व राजनीतिक दलों लोगों को जमकर ठगा था। बहुजन समुदाय को जातियों में बांटकर, आपस में ही लड़ाने का कार्य किया था। अल्पसंख्यकों के हाथों खुलेआम पिटवाया था। 15 प्रतिशत लोग 80 प्रतिशत पर भारी थे। लगातार शोषित हो रहे देश के इस बहुजन वर्ग को 2014 में लगा था कि अब हमारा नायक आ गया है। अब बहुजन हित चलेगा, किसी गुट विशेष, वर्ग विशेष को खुश करने के लिए बहुसंख्यकों की बलि नहीं ली जाएगी। अब अराजकता का बोलबाला नहीं रहेगा। अब भीड़ का तंत्र नहीं रहेगा यानी किसी शुक्रवार को कुछ सौ या कुछ हजार लोग सड़क पर बवाल मचाकर सत्ता से मनमानी निर्णय नहीं करा सकेंगे। सही मायने में लोकतंत्र आएगा और बहुजनों की भावनाओं का भी ध्यान रखा जाएगा।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से देश को बहुत ज्यादा ही अपेक्षाएं रहीं हैं। एक मरे पड़े कॉकरोच आंदोलन को पहले बवाल में बदलने देकर फिर उसके दबाव में 25 जुलाई 2026 को अपने शिक्षा मंत्री का इस्तीफा लेकर प्रधानमंत्री ने अपने इसी चाहने वाले वर्ग का दिल तोड़ा है। भाजपा समर्थक इसे कितना भी मास्टर स्ट्रोक करार देने का प्रयास करें पर वास्तविकता यही है कि मोदी के समर्थक वर्ग पर इस निर्णय से बहुत ही गहरी चोट लगी है। वैसे यह पहली बार नहीं हुआ है जब मोदी ने अपने समर्थकों की भावनाओं को तार तार किया है। पिछले 12 वर्षों में ऐसी आधा दर्जन से अधिक घटनाएं हो चुकी हैं जिसमें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनके सहयोगी अमित शाह ने यह साबित किया है कि वह “रणछोड़दास” हैं। आइये कॉकरोच कांड के पूर्व मोदी के पलायनवादी स्वभाव का परिचय कराने वाली प्रमुख घटनाओं पर एक नजर डालते हैं।
घरेलू दबाव में झुकना MODI की पुरानी आदत
2014 से 2026 के बीच ऐसे कई अवसर आए जब केंद्र सरकार ने विरोध प्रदर्शनों के चलते अपने नीतिगत निर्णयों, विधेयकों को वापस लिया या संशोधित किया। इसकी शुरुआत भूमि अधिग्रहण अध्यादेश (Land Acquisition Ordinance) के साथ वर्ष 2015 में ही हो गई थी। पूर्व की कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार ने 2013 में एक भूमि अधिग्रहण कानून बनाया था। मोदी सरकार ने औद्योगिक विकास को बढ़ावा देने के लिए इस कानून के कुछ प्रावधानों में परिवर्तन करने का अध्यादेश जारी किया था। इसमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण था अधिग्रहण के लिए सत्तर से अस्सी प्रतिशत भूमि मालिकों की सहमति की आवश्यकता। 2013 के कानून में इस सहमति के बिना भूमि अधिग्रहण नहीं किया जा सकता था। इसे किसान सहमति व सामाजिक प्रभाव आकलन कहा जाता है। मोदी सरकार ने सड़क, विशेष औद्योगिक क्लस्टर आदि कुछ विशेष सार्वजनिक कार्यों के लिए किसान सहमति व सामाजिक प्रभाव आकलन की अनिवार्यता को समाप्त करने का प्रस्ताव किया था। इसका विभिन्न किसान संगठनों, ट्रेड यूनियनों और विपक्षी दलों ने जोरदार विरोध किया था और इसे किसान विरोधी बताया था। अगस्त 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ में घोषणा की कि सरकार इस अध्यादेश को दोबारा जारी नहीं करेगी और कानून को उसके मूल स्वरूप में ही रहने दिया जाएगा।
SC/ST अधिनियम पर MODI ने पलटा था सर्वोच्च न्यायालय का निर्देश
एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम में बदलाव के मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ। मार्च 2018 में सर्वोच्च न्यायालय ने SC/ST अधिनियम के तहत होने वाली तुरंत गिरफ्तारी पर रोक लगाने और अग्रिम जमानत का प्रावधान करने का फैसला सुनाया था। सर्व समाज में सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय की काफी सराहना हुई थी और भाजपा के कोर वोटर रहे गैर एससी/एसटी समाज ने इससे काफी राहत की सांस ली थी। तमाम रिपोर्ट में यह बात साबित हो चुकी थी कि एससी/एसटी के ज्यादातर मुकदमे फर्जी व दबाव बनाने के लिए किए जाते हैं। यही वजह रही है कि इन मुकदमों में सजा की दर काफी कम रही है। अधिकांश मामले आपसी सुलह से निपट जाते रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ दो अप्रैल 2018 को विभिन्न दलित व आदिवासी संगठनों ने ‘भारत बंद’ का आह्वान किया। 2019 के लोकसभा चुनाव की तैयारी कर रही मोदी सरकार इस दबाव के आगे झुक गई। अगस्त 2018 में केंद्र सरकार ने संसद में SC/ST (Prevention of Atrocities) Amendment Act, 2018 पारित कर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को पलट दिया और कानून में मूल प्रावधानों (बिना पूर्व अनुमति गिरफ्तारी) को बहाल कर दिया। इसने भाजपा के कोर वोटर्स को काफी नाराज किया था। इसके बावजूद 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने अपना अब तक का सबसे बेहतर परिणाम हासिल किया था।
भीड़ के आगे झुके MODI ने लिया था तीन कृषि कानून वापसी का निर्णय
तीन कृषि कानूनों की वापसी इन सब में अब तक का सबसे बड़ा मामला रहा। कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य विधेयक, कृषक सशक्तिकरण और संरक्षण कीमत आश्वासन विधेयक, तथा आवश्यक वस्तु संशोधन विधेयक के नाम से यह तीन कृषक कानून वही थे जिसे लागू करने की घोषणा कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दलों ने अपने घोषणा पत्रों में कर रखी थी। कृषि के क्षेत्र में नए सुधार लागू कर किसानों को आमदनी के मामले में आत्मनिर्भर बनाने के लिए तमाम विशेषज्ञ समितियों ने भी इन कृषि कानूनों को लाने की वकालत कर रखी थी। सितंबर 2020 में केंद्र सरकार ने संसद से इन तीन नए कृषि कानून पारित कर दिए। इसके बाद पंजाब, हरियाणा, पश्चिम उत्तर प्रदेश आदि के किसान संगठनों ने दिल्ली की सीमाओं (सिंघू, टिकरी व गाजीपुर) पर धरना दे दिया। एक साल से अधिक समय तक ऐतिहासिक आंदोलन चलाया। हाईवे जाम कर किए गए इस आंदोलन ने लाखों नागरिकों को वर्ष पर्यन्त काफी असुविधा दी। इसके बावजूद मोदी सरकार ने सड़क पर जमे कुछ हजार आंदोलनकारियों को हटाने की जहमत नहीं उठाई। इसकी जगह 19 नवंबर 2021 को गुरु पर्व के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम संबोधन में तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा कर दी। दिसंबर 2021 में संसद के शीतकालीन सत्र में औपचारिक रूप से इन्हें निरस्त (Repeal) कर दिया गया। शाहीन बाग और कथित किसान आंदोलन ने भाजपा के समर्थक वर्ग को काफी परेशान व निराश किया था। पर मोदी शाह की जोड़ी ने अपने इस समर्थक वर्ग को मरहम लगाने की कोई कोशिश नहीं की। लाखों समर्थकों की जगह कुछ हजार की भीड़ को तरजीह दी।
ट्रांसपोर्टरों के दबाव में हिट-एंड-रन कानून भी बदला
भारतीय न्याय संहिता की हिट-एंड-रन कानून के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। जनवरी 2024 में नए आपराधिक कानून ‘भारतीय न्याय संहिता’ (BNS) में हिट-एंड-रन मामलों के लिए 10 साल तक की जेल और भारी जुर्माने का सख्त प्रावधान शामिल किया गया था। ऑल इंडिया मोटर ट्रांसपोर्ट कांग्रेस की अगुवाई में देशभर के ट्रक, बस व कैब चालकों ने हड़ताल कर दी। लोकसभा चुनाव की तैयारियों में जुटी मोदी सरकार इससे दबाव में आ गई। गृह मंत्रालय ने मोटर ट्रांसपोर्ट प्रतिनिधियों के साथ बैठक कर स्पष्ट किया कि ट्रांसपोर्ट संगठनों से विचार-विमर्श किए बिना इस प्रावधान को लागू नहीं किया जाएगा।
आरक्षण का हल्ला मचते ही लैटरल एंट्री बंद, ब्रॉडकास्ट सर्विस रेगुलेशन बिल वापस
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के रणछोड़दास की छवि को पुख्ता करने वाली एक और घटना यूपीएससी लैटरल एंट्री विज्ञापन की वापसी है। सरकार में विभिन्न क्षेत्र के सफल पेशेवरों को शामिल कर सरकारी मशीनरी को विकसित भारत की संकल्पना के अनुरूप कार्यकुशल बनाने के लिए अगस्त 2024 में संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) ने संघ सरकार के विभिन्न मंत्रालयों में 45 संयुक्त सचिव और निदेशक/उप सचिव पदों के लिए ‘लैटरल एंट्री’ (सीधी भर्ती) का विज्ञापन जारी किया था। इसे विभिन्न विपक्षी दलों ने आरक्षित वर्ग के हितों के खिलाफ बता दिया। आरोप लगाया कि लैटरल एंट्री में SC, ST और OBC वर्गों को आरक्षण नहीं दिया जा रहा है। इसे देखते हुए कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) के निर्देश पर UPSC ने 20 अगस्त 2024 को इस विज्ञापन को तुरंत रद्द कर दिया।
ब्रॉडकास्ट सर्विस रेगुलेशन बिल इसका एक और नमूना है। अगस्त 2024 में सरकार ने एक नया प्रसारण सेवा विनियमन विधेयक (Broadcast Services Regulation Bill) प्रस्तावित किया था। इसमें डिजिटल कंटेंट क्रिएटर्स, यूट्यूबर्स और ऑनलाइन न्यूज पोर्टल्स को भी सख्त नियमों के दायरे में लाने का प्रस्ताव था। इसको लेकर स्वतंत्र पत्रकारों, डिजिटल मीडिया क्रिएटर्स और नागरिक अधिकार संगठनों ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला बताया। अगस्त 2024 में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने इस मसौदे को वापस ले लिया और हितधारकों से दोबारा व्यापक परामर्श करने की बात कही।
Cockroch Protest में अराजक तत्वों पर कार्रवाई न करने से नाराजगी
नीट विवाद और कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का आंदोलन इसी कड़ी में एक महत्वपूर्ण घटना है। तीन मई 2026 को नीट की परीक्षा हुई थी। 12 मई को इस परीक्षा में पेपर लीक होने का पता चला था और परीक्षा निरस्त कर दी गई थी। तब तक कॉकरोचों का कहीं अता पता नहीं था। 15 मई 2026 को सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कुछ बेरोजगार युवाओं की तुलना कॉकरोच से करते हुए कहा कि वह आगे चलकर मीडिया, इंटरनेट मीडिया में चले जाते हैं या आरटीआइ एक्टिविस्ट बन जाते हैं और सिस्टम पर हमला करने लगते हैं। इस टिप्पणी पर व्यापक प्रतिक्रिया हुई थी। 15 मई 2026 को ही यूएसए में बैठे अभिजीत दिपके ने सोशल मीडिया पर कॉकरोच जनता पार्टी का गठन कर दिया। यह व्यंग्यात्मक युवा आंदोलन बहुत तेजी से फैल गया। देखते देखते कॉकरोच जनता पार्टी के दो करोड़ फॉलोवर बन गए। यह अलग बात है कि छह जून को दिल्ली में विरोध प्रदर्शन करने पहुंचे दीपके को आंदोलन के लिए समर्थक ढूढ़े नहीं मिले। बीस जून से दीपके ने जंतर मंतर पर धरना शुरू किया। नौ जुलाई तक इस धरना प्रदर्शन में दो सौ तीन सौ समर्थक भी मुश्किल से थे। केन्द्र सरकार ने इस धरने को समाप्त कराने के लिए तब तक कोई प्रयास नहीं किया। इसके बाद तमाम विपक्षी दल जंतर मंतर पर लामबंद होने लगे। बीस जुलाई को संसद मार्च के बवाल में हजारों लोग पहुंचे जिन्होने तोड़फोड़, पुलिस पर पथराव, जान लेवा हमला, महिला पत्रकारों व सुरक्षाकर्मियों से अश्लीलता आदि तमाम हरकतें कीं। इस विरोध प्रदर्शन को देख कर भाजपा समर्थकों को लग रहा था कि मोदी सरकार या गृह मंत्री अमित शाह आंदोलन के नाम पर अराजकता फैला रहे लोगों पर कोई सख्त कार्रवाई जरूर करेंगे। पर अंत में ऐसा नहीं हुआ। देश भर में अराजकता फैलने से रोकने के नाम पर मोदी सरकार कुछ हजार की भीड़ के सामने एक बार फिर सरेंडर हो गई। इस तरह मोदी ने अपने करोड़ों समर्थकों को निराश करते हुए अपनी रणछोड़दास की छवि को और पुख्ता कर लिया।
बंगाल व पंजाब सरकारों को भी नहीं किया था बर्खास्त
वैसे इन घटनाओं से भी गंभीर घटनाएं इन बारह वर्षों में घटी हैं। इनमें बंगाल में 2021 के चुनाव के बाद हजारों भाजपा समर्थकों का जबर्दस्त उत्पीड़न भी शामिल है। 2020 में जब भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा पर जानलेवा हमला हुआ था या 2021 में अन्य केंद्रीय मंत्रियों पर हमला हुआ था, तब भी भाजपा समर्थक मान रहे थे कि मोदी बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगा देंगे पर मोदी ने ऐसा नहीं किया। पांच साल तक भाजपा समर्थकों, केन्द्र सरकार के अधिकारियों आदि को बंगाल में पिटने व उत्पीड़ित होने के लिए छोड़ दिया। 56 इंच की छाती वाले सिर्फ दिल्ली में बैठ कर तमाशा देखते रहे। पांच जनवरी 2022 को तो खुद मोदी की जान खतरे में पड़ गई थी। पंजाब के दौरे पर गए मोदी का काफिला फिरोजपुर में एक फ्लाईओवर पर फंस गया था। सामने किसान प्रदर्शन कारी सड़क जाम कर खड़े थे। इस घटना ने देश को सकते में ला दिया था। सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर जांच के आदेश दिए थे। इस घटना के बाद सबको लग रहा था कि मोदी पंजाब की तत्कालीन चन्नी सरकार को हटाकर राष्ट्रपति शासन लगा देंगे पर तब भी ऐसा नहीं हुआ। तो कुल मिलाकर दबाव में मैदान छोड़ जाना अमित शाह व नरेन्द्र मोदी की आदत रही है। अब समर्थक भले उनके हर कदम को मास्टर स्ट्रोक बता कर अपने आंसू पोंछते रहे।