पेट्रोल डीजल संकट : गजब तमाशा है भाई
अमेरिका ईरान युद्ध (IranUSWAr) से उत्पन्न वैश्विक संकट के बीच प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देशवासियों से पेट्रोल व डीजल (Petrol-diesel crisis) बचाने का आह्वान किया। परिवार के मुखिया की तरह उनका यह आह्वान एक दम समीचीन था। यह अलग बात है कि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, दिल्ली व बिहार जैसे राज्यों में इस आह्वान पर अमल के नाम पर जमकर नाटक हुआ। उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपना काफिला आधा कर देने की घोषणा की। इसके बाद उपमुख्यमंत्रियों व अन्य मंत्रियों ने भी अपने अपने स्टाइल में पब्लिसिटी स्टंट दिखाया। वित्त मंत्री सुरेश खन्ना तो एक दिन साइकिल पर ही विधानसभा चले आए। यह सारी नौटंकी प्रदेश की आम जनता टकटकी लगाए देख रही थी और सोच रही थी कि हमारे पास तो सिर्फ एक बाइक ही है। अब पेट्रोल बचाने को काफिला आधा करने के उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री व मंत्रियों द्वारा प्रस्तुत उदाहरणों को देखते हुए क्या बाइक का एक पहिया निकाल कर चलाना पड़ेगा…।
प्रदेश में योगी सरकार के दो टर्म भले ही पूरे होने जा रहे हों पर कहीं भी सस्ती व समयबद्ध सार्वजनिक परिवहन सुविधा उपलब्ध नहीं हो पाई है। आम जनता के पास सबसे सस्ती व सुलभ यातायात की अगर कोई व्यवस्था है तो वह है उसकी बाइक…। वैश्विक संकट की इस घड़ी में प्रदेश में कहीं भी सस्ती व समयबद्ध सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था न होना योगी सरकार की सबसे बड़ी विफलता है। यह स्थिति और भी विकट तब बन जाती है जब आपको यह पता लगता है कि देश में उत्तर प्रदेश पेट्रोल व डीजल की खपत के मामले में पहले नंबर पर है।

प्रधानमंत्री समझते हैं सार्वजनिक परिवहन का महत्व
वैसे भी कहा जाता है कि सस्ती व समयबद्ध सार्वजनिक परिवहन प्रणाली किसी भी जिले, राज्य या देश के विकास की रीढ़ होती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात से आए हैं। वहां 1970 व 80 के दशक से ही शहर से लेकर गांव तक सिटी व ग्रामीण बस सेवा का जाल बिछना शुरू हो गया था। इस सुविधा में समय के साथ वृद्धि होती गई। आज गुजरात के छोटे छोटे कस्बों तक में सिटी व ग्रामीण बसें समयबद्धता के साथ संचालित हैं। यही स्थिति महाराष्ट्र की भी है। यही वजह रही है कि प्रधानमंत्री के इस आह्वान पर आगे बढ़ने में इन राज्यों की जनता को कोई खास दिक्कत भी नहीं आई होगी। इन राज्यों में व्यक्तिगत वाहन या बाइक के विकल्प के तौर पर भरपूर सार्वजनिक वाहन समयबद्धता व किफायत के साथ उपलब्ध रहे हैं। अगर किसी को अपनी बाइक छोड़कर सिटी बस से यात्रा करनी पड़े तो थोड़ा समय अतिरिक्त लग सकता है, व्यस्त समय में थोड़ी परेशानी खड़े होकर यात्रा करने में हो सकती है पर सही समय पर गंतव्य तक कम खर्च में पहुंचने की पूरी गारंटी रहेगी। ऐसी कोई गारंटी उत्तर प्रदेश के किसी भी हिस्से में नहीं मिलेगी। गुजरात व महाराष्ट्र में बिजली के खंभों पर टंगे सिटी बस के टाइम टेबल किसी भी व्यक्ति को उसके निर्धारित समय पर गंतव्य तक पहुंचाने का भरोसा जताते हैं। यह स्थिति उत्तर प्रदेश ही नहीं, हिन्दी पट्टी के किसी भी राज्य में नहीं है।
मोदी ने सुधारी रेलवे की दशा
केंद्र में मोदी सरकार आने के बाद बुनियादी ढाचों के विकास को गति मिली। उन्होने हाईवे का जाल तेजी से बिछाया। साथ ही रेलवे के ढांचागत विकास पर काफी जोर दिया। रेलवे का विद्युतीकरण करने, डबल लाइन करने के साथ साथ ट्रेनों की रफ्तार बढ़ाने व सुविधाजनक लोकल ट्रेन उपलब्ध कराने तक के ढेरों कार्य किए जो आज आम जनता को एक बेहतर स्तर की सुविधा उपलब्ध करा रहे हैं। आज उत्तर प्रदेश में संचालित हो रही मेमू ट्रेनों को देखने के बाद पुरनिए आसानी से बता देंगे कि सिर्फ एक दशक पूर्व लोकल ट्रेन की क्या हालत थी। सस्ते के चक्कर में आम जनता जानवरों की तरह उन ट्रेनों में चलने को मजबूर थी जिसमें न सीट ढंग से थी, न अन्य सुविधाएं। ट्रेन के रुकते ही बिजली चली जाती थी। कोई समय सारिणी नहीं थी। एक-एक घंटे का सफर चार से पांच घंटे तक लंबा हो जाता था। 2006 में प्रकाशित एक समाचार के अनुसार अयोध्या से प्रयागराज की दूरी उस समय की लोकल ट्रेन बैलगाड़ी से भी कम औसत रफ्तार के साथ कवर कर रही थी। मोदी ने यह स्थिति काफी बदल दी पर उत्तर प्रदेश में प्रदेश सरकार के स्तर पर कोई कार्य नहीं हुआ।
अस्सी के दशक से शुरू हुआ सिटी बस का सफर

उत्तर प्रदेश के महानगरों में सिटी बस संचालन की शुरुआत अस्सी के दशक में हो गई थी। इसमें पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के जमाने में जवाहर लाल नेहरू अर्बन रिन्यूअल मिशन के तहत सिटी बसें उपलब्ध कराई गईं थी। यह प्रयोग दो से तीन साल में ही दम तोड़ गया। इसके बाद अनुबंधित बसों के सहारे महानगरीय बस सेवा संचालित की गई। गहरे नीले रंग की यह बसें आज भी बहुत से स्थानों पर दिख जाती हैं। यह पूरी तरह डग्गामार परिवहन सेवा ही थी। कहीं भी बस रोककर सवारी भरना, क्षमता से अधिक सवारी भरना व बिना किसी समय सारिणी के संचालन करना इसकी खासियत रही। प्रदेश में सस्ती, सुलभ व समयबद्ध सार्वजनिक परिवहन सेवा उपलब्ध कराना कभी किसी भी सरकार की प्राथमिकता में रहा ही नहीं। सिर्फ खानापूर्ति ही की जाती रही।

केंद्र सरकार की योजना के तहत यहां लो फ्लोर बसें उपलब्ध कराई गईं। इसके बाद बड़ी संख्या में इलेक्ट्रिक बसें उपलब्ध कराई गईं। अब केन्द्र सरकार की योजना थी तो बसें तो लेना ही था। इन्हें लिया भी गया। लखनऊ में ऐसी 115 बसें संचालित की जा रही। प्रयागराज में 90 बसें। ऐसे ही अन्य जिलों में भी बसें पहुंची हैं। वैसे नकल मारने व नौटंकी करने में उत्तर प्रदेश का कोई सानी नहीं है। स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत देश के विकसित राज्यों में महानगरीय बस सेवाओं को ट्रैक करने के लिए ऐप बनाए गए। उत्तर प्रदेश ने भी जिले जिले में ऐप बना डाला। गुजरात महाराष्ट्र में सिटी बसों का औसत किराया 1.30 रुपये से लेकर 1.50 रुपये प्रति किमी रहा तो यहां भी लगभग यही किराया निर्धारित कर दिया गया। इसके बावजूद आम जनता को सार्वजनिक परिवहन प्रणाली यानी सिटी बस लुभा नहीं पाई। उत्तर प्रदेश में संचालित सिटी बसें आम जनता का भरोसा जीतने में पूरी तरह नाकाम रहीं है। खुद परिवहन विभाग की रिपोर्ट की मानें तो प्रदेश में सिटी बसों का संचालन घाटे में हो रहा है। किराया कम होने के बावजूद बसें खाली चल रही हैं। लखनऊ में तो सिटी बसों के किराए में अभी मई 2026 में ही पांच रुपये की कमी की गई। आखिर यह स्थिति क्यों है। एक तरफ तो हम सस्ती, सुविधाजनक व समयबद्ध सार्वजनिक परिवहन प्रणाली की मांग कर रहे तो दूसरी ओर उत्तर प्रदेश में सस्ती व सुविधाजनक प्रणाली उपलब्ध होने के बावजूद कोई पूछने वाला नहीं दिख रहा। ऐसा क्यों।

उप्र की सिटी बस सेवा में समयबद्धता नदारद
यहां ध्यान देने योग्य सर्वाधिक महत्वपूर्ण शब्द समयबद्धता है। उत्तर प्रदेश की सार्वजनिक यातायात प्रणाली से यह शब्द सिरे से नदारद है। उत्तर प्रदेश में किसी भी नगर की सिटी बस का टाइम टेबल देखे तो उसमें लिखा मिलेगा, हर दस मिनट में एक बस या बीस मिनट में एक बस। अब जरा इसकी तुलना गुजरात या महाराष्ट्र के सिटी बस टाइम टेबल से करें तो पता चलेगा कि वहां साफ लिखा रहता है रूट नंबर… समय 7.11 एएम, 9.15 पीएम आदि आदि। यानी किस रूट की बस कितने बजे आएगी, इसका स्पष्ट समय लिखा रहता है। इतना ही नहीं, इस समय सारिणी का अनुपालन भी सुनिश्चित किया जाता है। इससे बस स्टॉप पर पहुंचने वाला व्यक्ति अपने गंतव्य तक जाने के लिए बस का प्रयोग करने को लेकर निश्चित हो सकता है।
जबकि उत्तर प्रदेश में इस समयबद्धता का पूरी तरह से अभाव है। उत्तर प्रदेश के किसी भी सिटी बस स्टॉप पर बस की प्रतीक्षा करने वाले ढूंढे नहीं मिलेंगे क्याें कि यहां कोई यह नहीं कह सकता कि अगली बस कब आएगी। इसके चलते अगर किसी को अपने गंतव्य के लिए सिटी बस का प्रयोग करना हो तो वह बिल्कुल भी यह नहीं जान सकता कि इसमें कितना समय लगेगा। समयबद्धता सुनिश्चित न होने की इस समस्या के चलते अधिकांश जनता सिटी बसों से दूरी ही बना कर रखती है। हकीकत यह है कि उत्तर प्रदेश में सिटी बस को चलाने वाले सरकारी बाबू व नेता आम जनता को स्कूल के समय, ऑफिस के समय या किसी कार्य से अस्पताल, कचहरी, बाजार आदि जाने आने के लिए उनके समय पर सिटी बस की समयबद्ध व पर्याप्त सेवा उपलब्ध कराने को तैयार ही नहीं रहे। यही वजह है कि राजधानी लखनऊ समेत प्रदेश के किसी भी नगर में सिटी बस के भरोसे व्यक्ति अपने दैनिक आवागमन को करने की कल्पना भी नहीं कर सकता। मजबूरी की बात अलग है।
दो तिहाई नगरीय क्षेत्र में सिटी बस सेवा नदारद
उत्तर प्रदेश में सिटी बसों को लेकर दूसरी सबसे बड़ी समस्या पहुंच को लेकर है। राजधानी लखनऊ जहां पूरी योगी सरकार रहती है, वहां भी लखनऊ सिटी ट्रांसपोर्ट सर्विसेज लिमिटेड का अगर मार्ग मानचित्र देंखे तो समझ में आएगा कि अधिकांश महानगर सिटी बसों की सेवा से अछूता है। लखनऊ के एक तिहाई मोहल्ले व क्षेत्र ऐसे हैं, जहां एक भी बस नहीं जाती। यहां बात विशुद्ध महानगरीय इलाकों की हो रही है, ग्रामीण इलाकों की नहीं। लखनऊ हो या प्रयागराज या फिर कानपुर, उत्तर प्रदेश में परिवहन विभाग ने कभी सभी मोहल्लों को सिटी बस से जोड़ने को अपनी प्राथमिकता बनाई ही नहीं। सिटी बसों को महानगरों में पूर्व की डग्गामार बसों या टेम्पो-टैक्सी की तरह चलाया जा रहा है। जहां सवारी दिखे रोक देना, जहां सवारी चाहे उतार देना। मुख्य मार्गों पर ही चलना आदि। वैसे ग्रामीण इलाकों के लिए भी प्रदेश सरकार कुछ नहीं कर रही है। सिटी बसों को नगर से सटे ग्रामीण क्षेत्रों से चला कर सरकार ग्रामीण बस सेवा की खानापूर्ति भर कर रही है। हाल ही में परिवहन मंत्री दयाशंकर सिंह ने हर गांव को जिला मुख्यालय से सीधी बस सेवा से जोड़ने का शिगूफा छोड़ा। खास बात यह है कि इसमें सरकार कुछ नहीं करने जा रही बल्कि निजी क्षेत्र की बसों को अनुबंध के आधार पर जोड़ने की कवायद की जा रही है। यह अनुबंधित बसें जनता को समयबद्ध सेवा उपलब्ध कराएंगी या अपना लाभ कमाने के लिए ज्यादा से ज्यादा सवारी भरने को प्राथमिकता देंगी, आसानी से समझा जा सकता है।

जाम देख लगाएं जनता की मजबूरी का अंदाजा
उत्तर प्रदेश में सिटी बसों की यह स्थिति देखते हुए आम जनता के लिए स्कूल या आफिस से लेकर बाजार जाने तक के लिए अपना वाहन निकालने के अलावा कोई सस्ता व समयबद्ध विकल्प ही नहीं बचता। सार्वजनिक परिवहन सुविधा की अनुपलब्धता आम जनता को किस कदर असर कर रही है, इसका अंदाजा किसी भी चौराहे पुल या फ्लाईओवर पर लगने वाले जाम को देख कर लगाया जा सकता है। जाम में फंसने वाले अधिकांश दो पहिया वाहन पर एक ही व्यक्ति सवार रहता है जो यह बताता है कि उसे अपने काम के लिए मजबूरी में दो पहिया वाहन लेकर निकलना पड़ा है। खासकर ऑफिस छूटने व जाने के समय लगने वाला जाम प्रदेश सरकार की नाकामी को ज्यादा स्पष्ट रूप से दिखाता है। अगर कार्यालय जाने आने के समय सार्वजनिक परिवहन उपलब्ध हो तो कोई भी जाम में खड़े होकर पेट्रोल न खर्च करे।
पेट्रोल डीजल की खपत में उप्र नंबर एक
पेट्रोल डीजल की खपत के मामले में उत्तर प्रदेश देश के अग्रणी राज्यों में शामिल है। हालात यह है कि उत्तर प्रदेश में औद्योगिक रूप से विकसित महाराष्ट्र, गुजरात व तमिलनाडु जैसे राज्यों से भी कहीं ज्यादा पेट्रोल डीजल की खपत होती है। देश के कुल ईंधन खपत में उत्तर प्रदेश का हिस्सा करीब 12 प्रतिशत है। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील पर पेट्रोल डीजल की खपत कम करके विदेशी मुद्रा बचाने की संभावना अन्य राज्यों के मुकाबले उत्तर प्रदेश में काफी ज्यादा है पर इसके लिए जनहित सर्वोपरि के साथ ही दूरगामी सोच वाली प्रदेश सरकार चाहिए। कम से कम योगी आदित्यनाथ व उनके नेतृत्व वाली सरकार तो ऐसी नहीं है। इस सरकार के पास जनहित सर्वोपरि व दूरगामी सोच,दोनो का सदंतर अभाव है। नौ साल से अधिक की सत्ता देखने के बाद तो कम से कम यही निष्कर्ष निकाला जा सकता है। तो जब तक सत्ताधीश जनता की समस्याओं का समाधान निकालने के बारे में सोचें जनता तो यही पूछ रही कि क्या प्रधानमंत्री की अपील पर उन्हें अपनी बाइक का एक पहिया निकाल कर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का अपने काफिले में 50 प्रतिशत की कटौती के मानक का अनुसरण करना चाहिए…।